Monday, September 15, 2008

रेल यात्रा


मेरी पहली (अकेले) रेल यात्रा में मुझे लखनऊ से मुंबई जाना पड़ा वहां मेरे पापा के दोस्त को इन्फोर्म कर दिया गया की लौंडा रिया है ..स्टेशन पे आके ले जइयो वर्ना मुंबई पहुच के फालतू में ही - हीरो के पेट पे लात पड़ जायेगी ..खैर .. मैं सवेरे सवेरे रेलवे स्टेशन पर उतरा तो एक सज्जन सामने ही खड़े मिल गए उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया तो मेरी बाँछें ( पता नहीं शरीर के कौन से हिस्से में होती हैं ) खिल गयीं ... लगा कि ..लो जी गए पापा के दोस्त ... पर उन्होंने ने मुझे पहचान कैसे लिया? ..हो सकता है कि बाप से शकल मिलने के कारण .....मैंने भी बडी गर्मजोशी से अपना हाथ उनके हवाले कर दिया । लेकिन तभी वो हो गया जो नही होने चाहिए था..... हाय री मेरी किस्मत .... मेरी आशा उस समय निराशा में बदल गयी जब उन्होंने कहा," ए मिस्टर ! होशियारी मत दिखाओ , टिकिट दिखाओ . " इससे पहले कि मैं हँसी का पात्र बनूँ , मैं टिकिट दिखा कर वहाँ से चलता बना ।....

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