Monday, September 15, 2008

इंजीनियर

इंजीनियर वों हैं
जो अक्सर फसता है
साझात्कर के सवाल मे
बड़ी कम्पनी के जाल मे
बासँ और कलाइँट के बवाल मे,
इंजीनियर वो हैं,
जो पक गया है,
मीटिंग की झेलाई मे,
सबमिसन की गहराई मे,
टीमवर्क की चटाइँ मे
इंजीनियर वो हैं,
जो लगा रहता है,
सिडुयुल को फिसलाने मे
टार्गेट्स को खिसकाने मे
रोज़ नए नए बहाने बनाने मे
इंजीनियर वो हँ
जो लंच टाइम मे ब्रेंकफास्ट लेता है
डिनर टाइम मे लंच करता है , और
कोम्मुटेशन के वक्त सोया करता है
इंजीनियर वोह है
जो पागल है
चाय और समोसें के प्यार मे
सिगरेट के खुमार मे
बँढ्वाचिंग के विचार मे
इंजीनियर वो है
जो खोया है
रिमान्ड्र्सँ के जवाब मे
न मिलने वाले हिसाब मे
बेहतर भविष्य के ख्वाब मे
इंजीनियर वो है
जिसे इंतज़ार है
वीकएंड नाइट पर धूम मचने का
बॉस के छूटी पर जाने का
इन्क्रीमेंट की ख़बर आने का
इंजीनियर वो हँ i
जो सोचता है
काश पढ़ाई पर ध्यान दिया होता
काश टीचर से पंगा न लिया होता

एक शिक्षाप्रद कहानी

एक थे सेठ जी। जैसा कि आम तौर पर कहानियों में होता है, सेठ जी बड़े दयालु थे। और प्रायः पुण्य इत्यादि करने के वास्ते हरिद्वार वगैरह जाते रहते थे। एक बार वह गंगासागर की यात्रा पर गए।कहते हैं, सब धाम बार-बार गंगासागर एक बार। और ये भी मान्यता है कि गंगासागर जैसी पवित्र जगह में अपनी एक बुरी आदत छोड़कर ही आना चाहिए। इस बाबत सेठ जी अपने दोस्त से बातें कर ही रहे थे॥और उसे बता रहे थे कि इस बार वह अपने बात-बात में गुस्सा हो जाने की आदत को गंगासागर में ही छोड़कर आए हैँ।

सेठ जी का दोस्त बड़ा खुश हुआ, सेठानी भी मन ही मन नाच उठी कि अब तो सेठ जी उसे हर बात पर नहीं डांटेंगे। और ऐसा भी हमेशा होता है कि सेठ जी लोगों का एक नौकर होता है और आमतौर पर उसका नाम रामू ही होता है। इन सेठ जी के भी नौकर का नाम भी रामू ही था।

तो रामू ने सेठ जी के लिए पानी का गिलास रखचे हुए पूछा कि सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? सेठ जी जवाब दिया- गुस्सा।रामू पानी रखकर चला गया। फिर छोड़ी देर बाद जब वह ग्लास उठाने आया तो उसेने फिर पूछा - सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? सेठजी ने मुस्कुराते हुए कहा - गुस्सा छोड़ कर आया हूं।

कुछ देर और बीता रामू फिर सवाल लेकर आ गया- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? सेठ जी थोड़े झल्लाए तो सही लेकिन उन्होंने अपने-आपको जब्त करते हुए कहा कि मैं गंगासागर में गुस्सा छोड़कर आया हूं।

फिर रात के खाने का वक्त आया- रामू फिर खुद को रोक न पाया, पूछ ही बैठा- सेठ जी आप गंगासागर में क्या छोड़कर आए ? अब तो सेठ जी का पारा गरम हो गया। जूता उठा कर नौकर को दचकते हुए उन्होंने कहा कि हरामखोर। तब से कहे जा रहा हूं कि गुस्सा छोड़कर आया हूं तो सुनता नहीं? हर जूते के साथ सेठ जी कहते सुन बे रमुए, गुस्सा छोड़ कर आया हूं, गुस्सा।

इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है? पता नहीं आपको क्या शिक्षा मिली, मुझे तो ये मिली कि
नंबर १- किसी सेठ के यहां नौकरी मत करो।
नंबर- नौकरी करनी ही पड़ जाए तो सेठ से सवाल मत पूछो और नियम पालन करो कि सेठ एज़ आलवेज़ राइट
नंबर३- कभी किसी सेठ की बात का भरोसा मत करो, चाहे वह गंगासागर से ही क्यों न आया हो।



रेल यात्रा


मेरी पहली (अकेले) रेल यात्रा में मुझे लखनऊ से मुंबई जाना पड़ा वहां मेरे पापा के दोस्त को इन्फोर्म कर दिया गया की लौंडा रिया है ..स्टेशन पे आके ले जइयो वर्ना मुंबई पहुच के फालतू में ही - हीरो के पेट पे लात पड़ जायेगी ..खैर .. मैं सवेरे सवेरे रेलवे स्टेशन पर उतरा तो एक सज्जन सामने ही खड़े मिल गए उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया तो मेरी बाँछें ( पता नहीं शरीर के कौन से हिस्से में होती हैं ) खिल गयीं ... लगा कि ..लो जी गए पापा के दोस्त ... पर उन्होंने ने मुझे पहचान कैसे लिया? ..हो सकता है कि बाप से शकल मिलने के कारण .....मैंने भी बडी गर्मजोशी से अपना हाथ उनके हवाले कर दिया । लेकिन तभी वो हो गया जो नही होने चाहिए था..... हाय री मेरी किस्मत .... मेरी आशा उस समय निराशा में बदल गयी जब उन्होंने कहा," ए मिस्टर ! होशियारी मत दिखाओ , टिकिट दिखाओ . " इससे पहले कि मैं हँसी का पात्र बनूँ , मैं टिकिट दिखा कर वहाँ से चलता बना ।....
चलो भइया हम भी आ गए ब्लॉग्गिंग की दुनिया में.....
अब अपने दिल की भड़ास जी खोल के निकाल सकेंगे ......साला कोई रोकने- टोकने वाला नही ।
तो मेरे दोस्तों- यारों... तैयार हो जाओ अपनी देसी भाषा में अलग अलग टाइप की बकवास पढ़ने के लिए ....